With You; Without You book review

प्रभात रंजन द्वारा रचित उपन्यास, विद यू; विदाउट यू मैंने हाल में ही पढ़ी है। उनकी कहानी काफी अच्छी एवं इंसानी जज्बातों को प्रगट करने वाली है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। शुरू से लेके अंत तक मुझे ये पता ही नहीं चला की मैंने कितनी जल्दी इस उपन्यास को पढ़ डाला। आप अगर खुद इस पुस्तक को पढ़ेंगे तब आपको पता चलेगा मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ। इस कहानी में कुछ तो खास है जो पाठकों को बस लुभाए एवं उलझाए रखती है और लेखक इस काम में बहुत सफल हुए हैं। हमें तो बस वही दीखता और पढ़ने को मिलता है जो लेखक पन्नों के पीछे से पढ़ाते और दिखाते हैं

निशिंद की जिंदगी मानो दिल को छू जाती है। जैसे वो एक भंवर में फंसा हो और छटपटा रहा हो बाहर आने के लिए…. वो रमी से मुहब्बत भी करता है और उसकी दोस्ती भी नहीं खोना चाहता पर हाँ, ये जरूर चाहता है की रमी किसी और को मुहब्बत भी न करे। बस यहीं गलती हो जाती है निशिनद से और वो अपने दोस्त और अपनी मुहब्बत दोनों से हाथ धो बैठा ! उस तरफ आदित्य जो की उसका बहुत करीबी मित्र है वो भी उससे दूर हो जाता है। आपको, एक पाठक के तौर पे, बस यही लगेगा मानो निशिनद बस आप ही हो गए क्यूंकि किसी से मुहब्बत हो जाना इंसान की जिंदगी का बहुत ही नाजुक दौर होता है और लेखक प्रभात रंजन ने बखूबी इस बात को दर्शाया है अपनी पुस्तक में। जिस तरह से उन्होंने उहापोह एवं विस्मय का वर्णन किया है मानो एकदम से दृश्य जिवंत से हो जाते हैं आपकी आँखों के सामने!

रमी का कैरेक्टर भी बिलकुल निखार के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है लेखक ने अपनी पहली ही पुस्तक में। प्रभात जी ने फेमिनिज्म के सारे पुराने नुस्खों से हटके कुछ दिया है पाठकों को जो मुझे तो बहुत ही पसंद आया। जिस बेबाकी से रमी अपनी बातें कहती हैं वो वाकई तारीफे काबिल है! उसकी जिंदगी में उसके पेरेंट्स का प्रभाव हमें ये बताता है की हमसे कहाँ कहाँ चूक हुई है! जिस विश्वास से रमी अपने अस्तित्व जो संजोती है और अपने लिए खड़े होने का साहस करती है वो आपको यही बताएगा की आजकी नारियां अपना बचाव खुद कर सकने में पूरी तरह से समर्थ है!

आदित्य की जिंदगी में फेर-बदल बस यही दिखाता है की समाज कभी भी एक सामान लोगों से नहीं बन सकता है। हमारे आसपास ऐसे लोग हमेशा होंगे जो हर बातों में दूसरी तरह की सोच रखते हों। लेकिन अंत वाकई अच्छा होता है – कहानी में भी और ज़िन्दगी में भी (अक्सर ही) .

मैं तो लोगों से यही गुजारिश करूँगा की आप भी इस उपन्यास को जरूर पढ़ें और समझें की हिंदी साहित्य भी अब करवट लेना शुरू कर चूका है! कहीं से भी अंग्रेजी लिटरेचर से कम नहीं है हमारी भाषा और उसमे रचे जाना वाला साहित्य! प्रभात रंजन ने जिस तरह से अपनी बातें लोगो तक एक काल्पनिक कहानी के माध्यम से पहुंचाई है वो यही बताता है की उनके वाकपटुता में कोई कमी नहीं और तभी तो उनकी अगली पुस्तक भी कुछ ऐसी ही है! प्रेम और रिश्ते-नाते और युवा मन में होने वाली हलचलों से ओतप्रोत ये उपन्यास जरूर आपको बहुत पसंद आएगा!

अगर आप इस पुस्तक को अभी खरीदना चाहते हैं तो निचे दिए हुए लिंक से खरीद सकते हैं।

With You; Without You – know more and buy

 

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